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पहली दफा…

कल रात आउटिंग हास्टल की,

वो चमचमाता नैनीताल, आज से पहले न देखा था;

और ताल में चमचमाती परछाई,

देखी थी पहली दफा…

टूरिस्ट्स से लबालब ज़ूमलैण्ड,

रात ही रौशनी में अलग ही चमकता था,

हर किनारे की रोशनी, वो शाम की मासूमियत;

देखी थी पहली दफा…

और आज हाॅस्टल खुले बिना,

कुकी* और मेरा पिछले गेट से बाहर आना,

और मेन गेट कूदकर पार करना,

तीन सालों में ये आजादी, आज;

देखी थी पहली दफा…

जहाँ कल रात देखा चमचमाता तिब्बती बाजार,

वहाँ सुबह की नरम हवाएँ हैं, 

सादगी परिपूर्ण नैनीताल, 

सोकर उठी नैना देवी, आज ;

देखी थीं पहली दफा….

ताल में अलग ही ठहराव,

सूरज की रोशनी छेड़ रही थी इस ठहराव को,

ताल किनारे बैठ ये प्रेम कहानी, आज;

देखी थी पहली दफा…

इस पार अरविन्द मार्ग*,

और मन्दिरों की वो सात्विक गन्ध,

यूँ तो हर क्षण शोर की गोद में मालरोड,

शोर बिना ये मालरोड, आज;

देखी थी पहली दफा…

रात को सौन्दर्य चहल पहल का,

अभी  सादगी भरा नैनीताल,

एक ही रुप में दो आभाएँ, आज;

देखीं थीं पहली दफा……

कुकी – सहेली का प्यार भरा नाम

अरविन्द मार्ग-  नैनीताल की प्रसिद्ध ठण्डी सड़क

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भोर बस यूँही

उस पार मैंने देखा यूँही,

भोर वहाँ भी हुई,

सूरज उस पार भी  यूँ ही,

सूरज इस पार भी  यूँ ही…

सब लाली उसकी एक समान,

किरणें भी  एक सी हैं उसकी,

कुछ मुसकाए हैं देख उसे,

कुछ देख रहे हैं बस यूँ ही….

वो काम पर जाता अबोध बालक,

यहाँ माॅनिंग वाॅक जरुरी है,

भोर का आनन्द तो है इस पार,

वो बालक तो बस यूँही…

आँखें मलता जाता बालक,

स्फूर्ति नवल इस पार है,

जीवन आनन्दित है इस पार,

उस बालक का तो बस यूँ ही…

एक समान थीं जो अब तक,

वो किरणें भी अब बँट चुकी हैं,

प्रकाशित जीवन है इस पार,

उस बालक का तो बस यूँ ही…