Posted in स्वरचित, Hindi Urdu Poems

जिंदा होने के लिए

सांस लेना तो हर शख्स की मज़बूरी है

जिंदा होने के लिए कलेजा भी जरूरी है

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किस की मुहब्बत पूरी हो पायी आज तक

देख,जमीं और आसमां में कितनी दूरी है।

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मैं भी शराफत के लबादो में खंजर रक्खे हूँ

तबाह करने की उनकी तैयारी भी पूरी है।

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उसकी जानिब देख के झुक जाती है

मेरी आँखों की भी जरुर  कुछ मज़बूरी है।

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मेरे लफ्जों के मानी,जब से तू गया है

मेरी लिखी हर एक गजल अधूरी है।

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तेरा संग ए दिल

अपना दर्द अब किसको दिखाया जाए

उम्र भर इसे सीने से लगाया जाए।

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अदावते होती तो और बात थी यार

ये इश्क है,इसे कैसे छुपाया जाए।

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फोड़ने को सर अपना,चाहिए था पत्थर मुझे

तेरा संग ए दिल चलो आजमाया जाए।

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मोहब्बत जताते जताते हो गया वो रुसवा

अब रोया जाए या फिर जश्न मनाया जाए।

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नजूमी बताता रहता है क़यामत के दिन

उसे हाल,शब ए हिज्र का बताया जाए।

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कुछ कुछ मेरे जख्म भरने लगे है

क्या फिर तेरी बज्म में आया जाए।

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इन दौड़ती मंजिलो को

इन दौड़ती भागती मंजिलो को थाम दे जरा

आँखे चौंधिया गयी है खुदा, आराम दे जरा।

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न दिल टूटता है ,न कोई रूठता है अब

हम बेरोजगार मजदूरों को कोई काम दे जरा।

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मेरे यार ने कहा है आज,अब तो पीनी ही है

खाली सही ही सही,मगर इक जाम दे जरा।

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कागजों पे हर मर्ज़ का इलाज़ करने वाले को

अस्पताल की जिन्दा लाशो का पयाम दे जरा।

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जो बोले और चलते गए वो मंजिल पर है

करने वाले लोगों को भी अब इनाम दे जरा।

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ये बेचारी मशीने मेरी हर बात मानती है पर

फिर वही यारो से झगड़ने वाली शाम दे ज़रा।

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तू बता क्या करूं

भस्म करके गुरुर अपना,करूं नित्य नवीन सृजन

या आकर वियोग में तेरे,कर दूँ नष्ट सम्पूर्ण गगन

की पी कर घूँट बिछोह का,नीलकंठ का रूप धरुं

तू बता क्या करूं,तू बता क्या करूं।

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हिमालय की वादियों सा तेरा रूप सौम्य,कोमल

ज्यूँ की बुरांश में उग आयी हो कोई नूतन कोंपल

रहूँ तेरी चांदनी में,या योग अमृत में डूब मरूं

तू बता क्या करूं तू बता क्या करूं।

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प्राप्ति कर लेना बड़ा या त्याग महान

सम्मोहन तेरा बड़ा,या बड़ा योग ध्यान

इन प्रश्नों की दौड़ में तेरे लिए कहाँ ठहरूं

तू बता क्या करूं,तू बता क्या करूं।

                                      -नारायण

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Piyush Mishra:A Rebel Poet

“शुक्र करो की हम दर्द सहते है,लिखते नहीं
वरना कागज़ पर लफ़्ज़ों के ज़नाज़े उठते”

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ये पोस्ट उस शख्स के बारे में है जो 52 साल का हो चुका है लेकिन अल्फाज़ों से बिलकुल लौंडा है।
ग्वालियर में पैदा हुए और NSD से ग्रेजुएट है,गाते है लिखते है एक्टिंग करते है और थिएटर में भी सक्रिय है।

कभी शराबी और गुस्सैल हुआ करते थे और ये बात आज भी बेबाकी से कहते है।

पिंक और गुलाल आदि फिल्मो में भी अभिनय कर चुके है।

उनकी किताब कुछ इश्क किया कुछ काम किया उनका कविता संग्रह है।

पियूष मिश्रा उस भाषा में लिखते है जो आम आदमी तक सीधे पहुंचे।

उनका गाना “आरम्भ है प्रचंड बोल मस्तको के झुण्ड” बहुत फेमस हुआ था। 

उनके लिखे “इक बगल में चाँद होगा इक बगल में रोटिया/दुनिया” का जादू हर वर्ग के लोगो पर चला।

सबसे पहले बिस्मिल के गाने का पियूष मिश्रा वर्जन पढिये।

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सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है जोर कितना बाज़ू-ए-कातिल में है

वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां

हम अभी से क्या बताये क्या हमारे दिल में है

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ओ रे बिस्मिल काश आते आज तुम हिन्दोस्तां

देखते कि मुल्क सारा ये टशन में थ्रिल में है

आज का लौंडा ये कहता हम तो बिस्मिल थक गए

अपनी आजादी तो भइय्या लौंडिया के तिल में हैं

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आज के जलसों में बिस्मिल एक गूंगा गा रहा

और बहरों का वो रेला नाचता महफ़िल में है

हाथ की खादी बनाने का ज़माना लड़ गया

आज तो चड्ढी भी सिलती इंग्लिशों की मिल में है

सरफ़रोशी की  तमन्ना अब हमारे दिल में है

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और अब पेश हैं दो शेर-

गुस्सा आदमी से बहुत कुछ करवाता है, 

और ये जो लव है ना लव? ये सिर्फ मरवाता है.

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आज मैंने फिर जज़्बात भेजे,

 आज तुमने फिर अलफ़ाज़ ही समझे.

वो बहुत अच्छा गाते भी है।
उनका कोक स्टूडियो में गाया हुआ गाना हुस्ना की लिंक शेयर कर रहा हूँ,साथ ही लिरिक्स भी

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लाहौर के उस 

पहले जिले के 

दो परगना में पहुंचे 

रेशम गली के 

दूजे कूचे के 

चौथे मकां में पहुंचे 

और कहते हैं जिसको 

दूजा मुल्क उस

पाकिस्तां में पहुंचे 

लिखता हूँ ख़त में 

हिन्दोस्तां से

पहलू-ए हुसना पहुंचे 

ओ हुसना
मैं तो हूँ बैठा 

ओ हुसना मेरी 

यादों पुरानी में खोया 

पल-पल को गिनता 

पल-पल को चुनता

बीती कहानी में खोया 

पत्ते जब झड़ते 

हिन्दोस्तां में 

यादें तुम्हारी ये बोलें

होता उजाला हिन्दोस्तां में

बातें तुम्हारी ये बोलें

ओ हुसना मेरी

ये तो बता दो 

होता है, ऐसा क्या 

उस गुलिस्तां में 

रहती हो नन्हीं कबूतर सी

गुमसुम जहाँ 

ओ हुसना
पत्ते क्या झड़ते हैं 

पाकिस्तां में वैसे ही 

जैसे झड़ते यहाँ 

ओ हुसना

होता उजाला क्या

वैसा ही है 

जैसा होता हिन्दोस्तां यहाँ 

ओ हुसना 
वो हीरों के रांझे के नगमें 

मुझको अब तक, आ आके सताएं 

वो बुल्ले शाह की तकरीरों के

झीने झीने साये 

वो ईद की ईदी 

लम्बी नमाजें 

सेंवैय्यों की झालर

वो दिवाली के दीये संग में 

बैसाखी के बादल 

होली की वो लकड़ी जिनमें

संग-संग आंच लगाई

लोहड़ी का वो धुआं जिसमें

धड़कन है सुलगाई 

ओ हुसना मेरी 

ये तो बता दो

लोहड़ी का धुंआ क्या

अब भी निकलता है 

जैसा निकलता था

उस दौर में हाँ वहाँ

ओ हुसना
क्यों एक गुलसितां ये 

बर्बाद हो रहा है 

एक रंग स्याह काला 

इजाद हो रहा है 
ये हीरों के, रांझों के नगमे 

क्या अब भी, सुने जाते है हाँ वहाँ 

ओ हुसना

और

रोता है रातों में

पाकिस्तां क्या वैसे ही

जैसे हिन्दोस्तां 

ओ हुसना।

उनकी और रचनाएँ (इक बगल में चाँद/दुनिया)आगे की पोस्ट में आती रहेंगी

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दूसरा वनवास- कैफ़ी आज़मी

  • राम जन्म भूमि का मुद्दा आजकल बहुत चर्चा में है,राम जन्म भूमि पर क्या फैसला आयेगा यह तो वक्त बतायेगा परन्तु बाबरी ढाँचे के गिरने के बाद कैफ़ी आज़मी द्वारा,लिखी गयी यह बेहतरीन नज्म आपके सामने पेश है।

राम बनवास से जब लौटकर घर में आये

याद जंगल बहुत आया जो नगर में आये

रक्से-दीवानगी आंगन में जो देखा होगा

छह दिसम्बर को श्रीराम ने सोचा होगा

इतने दीवाने कहां से मेरे घर में आये
धर्म क्या उनका है, क्या जात है ये जानता कौन

घर ना जलता तो उन्हें रात में पहचानता कौन
घर जलाने को मेरा, लोग जो घर में आये

शाकाहारी हैं मेरे दोस्त, तुम्हारे ख़ंजर

तुमने बाबर की तरफ़ फेंके थे सारे पत्थर

है मेरे सर की ख़ता, ज़ख़्म जो सर में आये
पाँव सरयू में अभी राम ने धोये भी न थे

कि नज़र आये वहाँ ख़ून के गहरे धब्बे

पाँव धोये बिना सरयू के किनारे से उठे

राम ये कहते हुए अपने दुआरे से उठे

राजधानी की फज़ा आई नहीं रास मुझे

छह दिसम्बर को मिला दूसरा बनवास मुझे।