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मसान

इस पोस्ट में मैं बात करूँगा उस फिल्म की जिसने मुझे इसके बारे में लिखने पर मजबूर कर दिया|

“मसान” (यानी दाह संस्कार का स्थान) एक “लो बजट और हाईली इंटलेक्चुअल” फिल्म है,जोरदार अभिनय जबर्दस्त कहानी और बेहतरीन डायलोग|

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फिल्म में बनारस की दो कहानियां साथ साथ चलती है,दोनों प्रेम कथाये है परन्तु ख़ास बात ये की जैसे जैसे कहानी आगे बढती है वो समाज में जातिगत भेद,भ्रष्टाचार,लडकियों के प्रति छोटी सोच को उधेड़ती चली जाती है|

फिल्म प्री मारशिअल सेक्स और जातिगत भेद पर हमारी सोच को पुनरवलोकन के लिए मजबूर कर देती है|

और आंखिर ये फिम उन दो लोगो की दास्ताँ को भी बयां करती है जो अपना सब कुछ खो कर फिर से खड़े होते है और जिंदगी जीते है,और गंगा में पानी अनवरत बहता रहता है .और जीवन भी उसी तरह चलता ही रहता है चाहे परिस्तिथियाँ कुछ भी हो।

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फिल्म के अंत को देखने पर कुछ कुछ धर्मवीर भारती के उपन्यास गुनाहों के देवता वाली फीलिंग आती है|

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इस फिल्म के ये 5 डायलाग मुझे बेहद पसंद आये-

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1.फिल्म शुरू होते ही  ब्रिज नारायण चकबस्त का ये शेर आता है-

जिंदगी क्या है अनासिर में ज़हूर ए तरतीब 

मौत क्या है इन्ही अज़ा का परीशां होना 
(What is Life ,Just A Balance of Five Elements

What is Death, Disturbance of These elements)

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२.दीपक (नायक) के दोस्त उससे कहते है-

“लड़की अपर कास्ट है 

ज्यादा सेंटी वेंटी मत होना बे” 

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3.और फिर ये भनभनाता संवाद-
देवी – आप अकेले रहते है?

सध्या जी – नहीं पिताजी के साथ रहते है,पिताजी अकेले रहते है|

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4. दीपक – लैपटॉप नहीं तो प्रिंटआउट ही सही,पर उनके फेसबुक प्रोफाइल को ताकेंगे जरुर 

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5. और फिल्म का आंखिरी संवाद,जिसका अर्थ आप स्वयं निकाले-
संगम दो बार जाना चाहिए- एक बार अकेले और दूसरी बार किसी के साथ|

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फिल्म में दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल “तू किसी रेल सी गुजरती है” का दूसरा वर्शन गाने के रूप में पेश किया गया है जो बेहद खूबसूरत है 

“काठ के ताले है,आँख पे डाले है 

इनमे इशारों की चाभियाँ लगा 

रात जो बाकी है शाम से ताकी है 

नीयत में थोडी खराबियां लगा 

मैं हूँ पानी के बुलबुले जैसा 

तुझे देखूं तो फूट जाता हूँ”

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और अंत में इसी फिल्म के एक गाने की कुछ पंक्तिया-

“उम्र की गिनती हाथ न आई 

पुरखो ने ये बात बताई 

उल्टा करके देख सको तो 

अम्बर भी है गहरी खाई”

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