Posted in स्वरचित, Hindi Urdu Poems

जिंदा होने के लिए

सांस लेना तो हर शख्स की मज़बूरी है

जिंदा होने के लिए कलेजा भी जरूरी है

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किस की मुहब्बत पूरी हो पायी आज तक

देख,जमीं और आसमां में कितनी दूरी है।

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मैं भी शराफत के लबादो में खंजर रक्खे हूँ

तबाह करने की उनकी तैयारी भी पूरी है।

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उसकी जानिब देख के झुक जाती है

मेरी आँखों की भी जरुर  कुछ मज़बूरी है।

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मेरे लफ्जों के मानी,जब से तू गया है

मेरी लिखी हर एक गजल अधूरी है।

Posted in स्वरचित, Hindi Urdu Poems

तेरा संग ए दिल

अपना दर्द अब किसको दिखाया जाए

उम्र भर इसे सीने से लगाया जाए।

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अदावते होती तो और बात थी यार

ये इश्क है,इसे कैसे छुपाया जाए।

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फोड़ने को सर अपना,चाहिए था पत्थर मुझे

तेरा संग ए दिल चलो आजमाया जाए।

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मोहब्बत जताते जताते हो गया वो रुसवा

अब रोया जाए या फिर जश्न मनाया जाए।

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नजूमी बताता रहता है क़यामत के दिन

उसे हाल,शब ए हिज्र का बताया जाए।

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कुछ कुछ मेरे जख्म भरने लगे है

क्या फिर तेरी बज्म में आया जाए।

Posted in Book/Story

मसान

इस पोस्ट में मैं बात करूँगा उस फिल्म की जिसने मुझे इसके बारे में लिखने पर मजबूर कर दिया|

“मसान” (यानी दाह संस्कार का स्थान) एक “लो बजट और हाईली इंटलेक्चुअल” फिल्म है,जोरदार अभिनय जबर्दस्त कहानी और बेहतरीन डायलोग|

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फिल्म में बनारस की दो कहानियां साथ साथ चलती है,दोनों प्रेम कथाये है परन्तु ख़ास बात ये की जैसे जैसे कहानी आगे बढती है वो समाज में जातिगत भेद,भ्रष्टाचार,लडकियों के प्रति छोटी सोच को उधेड़ती चली जाती है|

फिल्म प्री मारशिअल सेक्स और जातिगत भेद पर हमारी सोच को पुनरवलोकन के लिए मजबूर कर देती है|

और आंखिर ये फिम उन दो लोगो की दास्ताँ को भी बयां करती है जो अपना सब कुछ खो कर फिर से खड़े होते है और जिंदगी जीते है,और गंगा में पानी अनवरत बहता रहता है .और जीवन भी उसी तरह चलता ही रहता है चाहे परिस्तिथियाँ कुछ भी हो।

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फिल्म के अंत को देखने पर कुछ कुछ धर्मवीर भारती के उपन्यास गुनाहों के देवता वाली फीलिंग आती है|

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इस फिल्म के ये 5 डायलाग मुझे बेहद पसंद आये-

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1.फिल्म शुरू होते ही  ब्रिज नारायण चकबस्त का ये शेर आता है-

जिंदगी क्या है अनासिर में ज़हूर ए तरतीब 

मौत क्या है इन्ही अज़ा का परीशां होना 
(What is Life ,Just A Balance of Five Elements

What is Death, Disturbance of These elements)

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२.दीपक (नायक) के दोस्त उससे कहते है-

“लड़की अपर कास्ट है 

ज्यादा सेंटी वेंटी मत होना बे” 

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3.और फिर ये भनभनाता संवाद-
देवी – आप अकेले रहते है?

सध्या जी – नहीं पिताजी के साथ रहते है,पिताजी अकेले रहते है|

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4. दीपक – लैपटॉप नहीं तो प्रिंटआउट ही सही,पर उनके फेसबुक प्रोफाइल को ताकेंगे जरुर 

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5. और फिल्म का आंखिरी संवाद,जिसका अर्थ आप स्वयं निकाले-
संगम दो बार जाना चाहिए- एक बार अकेले और दूसरी बार किसी के साथ|

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फिल्म में दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल “तू किसी रेल सी गुजरती है” का दूसरा वर्शन गाने के रूप में पेश किया गया है जो बेहद खूबसूरत है 

“काठ के ताले है,आँख पे डाले है 

इनमे इशारों की चाभियाँ लगा 

रात जो बाकी है शाम से ताकी है 

नीयत में थोडी खराबियां लगा 

मैं हूँ पानी के बुलबुले जैसा 

तुझे देखूं तो फूट जाता हूँ”

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और अंत में इसी फिल्म के एक गाने की कुछ पंक्तिया-

“उम्र की गिनती हाथ न आई 

पुरखो ने ये बात बताई 

उल्टा करके देख सको तो 

अम्बर भी है गहरी खाई”

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इन दौड़ती मंजिलो को

इन दौड़ती भागती मंजिलो को थाम दे जरा

आँखे चौंधिया गयी है खुदा, आराम दे जरा।

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न दिल टूटता है ,न कोई रूठता है अब

हम बेरोजगार मजदूरों को कोई काम दे जरा।

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मेरे यार ने कहा है आज,अब तो पीनी ही है

खाली सही ही सही,मगर इक जाम दे जरा।

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कागजों पे हर मर्ज़ का इलाज़ करने वाले को

अस्पताल की जिन्दा लाशो का पयाम दे जरा।

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जो बोले और चलते गए वो मंजिल पर है

करने वाले लोगों को भी अब इनाम दे जरा।

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ये बेचारी मशीने मेरी हर बात मानती है पर

फिर वही यारो से झगड़ने वाली शाम दे ज़रा।

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तू बता क्या करूं

भस्म करके गुरुर अपना,करूं नित्य नवीन सृजन

या आकर वियोग में तेरे,कर दूँ नष्ट सम्पूर्ण गगन

की पी कर घूँट बिछोह का,नीलकंठ का रूप धरुं

तू बता क्या करूं,तू बता क्या करूं।

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हिमालय की वादियों सा तेरा रूप सौम्य,कोमल

ज्यूँ की बुरांश में उग आयी हो कोई नूतन कोंपल

रहूँ तेरी चांदनी में,या योग अमृत में डूब मरूं

तू बता क्या करूं तू बता क्या करूं।

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प्राप्ति कर लेना बड़ा या त्याग महान

सम्मोहन तेरा बड़ा,या बड़ा योग ध्यान

इन प्रश्नों की दौड़ में तेरे लिए कहाँ ठहरूं

तू बता क्या करूं,तू बता क्या करूं।

                                      -नारायण

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Piyush Mishra:A Rebel Poet

“शुक्र करो की हम दर्द सहते है,लिखते नहीं
वरना कागज़ पर लफ़्ज़ों के ज़नाज़े उठते”

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ये पोस्ट उस शख्स के बारे में है जो 52 साल का हो चुका है लेकिन अल्फाज़ों से बिलकुल लौंडा है।
ग्वालियर में पैदा हुए और NSD से ग्रेजुएट है,गाते है लिखते है एक्टिंग करते है और थिएटर में भी सक्रिय है।

कभी शराबी और गुस्सैल हुआ करते थे और ये बात आज भी बेबाकी से कहते है।

पिंक और गुलाल आदि फिल्मो में भी अभिनय कर चुके है।

उनकी किताब कुछ इश्क किया कुछ काम किया उनका कविता संग्रह है।

पियूष मिश्रा उस भाषा में लिखते है जो आम आदमी तक सीधे पहुंचे।

उनका गाना “आरम्भ है प्रचंड बोल मस्तको के झुण्ड” बहुत फेमस हुआ था। 

उनके लिखे “इक बगल में चाँद होगा इक बगल में रोटिया/दुनिया” का जादू हर वर्ग के लोगो पर चला।

सबसे पहले बिस्मिल के गाने का पियूष मिश्रा वर्जन पढिये।

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सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है जोर कितना बाज़ू-ए-कातिल में है

वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां

हम अभी से क्या बताये क्या हमारे दिल में है

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ओ रे बिस्मिल काश आते आज तुम हिन्दोस्तां

देखते कि मुल्क सारा ये टशन में थ्रिल में है

आज का लौंडा ये कहता हम तो बिस्मिल थक गए

अपनी आजादी तो भइय्या लौंडिया के तिल में हैं

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आज के जलसों में बिस्मिल एक गूंगा गा रहा

और बहरों का वो रेला नाचता महफ़िल में है

हाथ की खादी बनाने का ज़माना लड़ गया

आज तो चड्ढी भी सिलती इंग्लिशों की मिल में है

सरफ़रोशी की  तमन्ना अब हमारे दिल में है

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और अब पेश हैं दो शेर-

गुस्सा आदमी से बहुत कुछ करवाता है, 

और ये जो लव है ना लव? ये सिर्फ मरवाता है.

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आज मैंने फिर जज़्बात भेजे,

 आज तुमने फिर अलफ़ाज़ ही समझे.

वो बहुत अच्छा गाते भी है।
उनका कोक स्टूडियो में गाया हुआ गाना हुस्ना की लिंक शेयर कर रहा हूँ,साथ ही लिरिक्स भी

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लाहौर के उस 

पहले जिले के 

दो परगना में पहुंचे 

रेशम गली के 

दूजे कूचे के 

चौथे मकां में पहुंचे 

और कहते हैं जिसको 

दूजा मुल्क उस

पाकिस्तां में पहुंचे 

लिखता हूँ ख़त में 

हिन्दोस्तां से

पहलू-ए हुसना पहुंचे 

ओ हुसना
मैं तो हूँ बैठा 

ओ हुसना मेरी 

यादों पुरानी में खोया 

पल-पल को गिनता 

पल-पल को चुनता

बीती कहानी में खोया 

पत्ते जब झड़ते 

हिन्दोस्तां में 

यादें तुम्हारी ये बोलें

होता उजाला हिन्दोस्तां में

बातें तुम्हारी ये बोलें

ओ हुसना मेरी

ये तो बता दो 

होता है, ऐसा क्या 

उस गुलिस्तां में 

रहती हो नन्हीं कबूतर सी

गुमसुम जहाँ 

ओ हुसना
पत्ते क्या झड़ते हैं 

पाकिस्तां में वैसे ही 

जैसे झड़ते यहाँ 

ओ हुसना

होता उजाला क्या

वैसा ही है 

जैसा होता हिन्दोस्तां यहाँ 

ओ हुसना 
वो हीरों के रांझे के नगमें 

मुझको अब तक, आ आके सताएं 

वो बुल्ले शाह की तकरीरों के

झीने झीने साये 

वो ईद की ईदी 

लम्बी नमाजें 

सेंवैय्यों की झालर

वो दिवाली के दीये संग में 

बैसाखी के बादल 

होली की वो लकड़ी जिनमें

संग-संग आंच लगाई

लोहड़ी का वो धुआं जिसमें

धड़कन है सुलगाई 

ओ हुसना मेरी 

ये तो बता दो

लोहड़ी का धुंआ क्या

अब भी निकलता है 

जैसा निकलता था

उस दौर में हाँ वहाँ

ओ हुसना
क्यों एक गुलसितां ये 

बर्बाद हो रहा है 

एक रंग स्याह काला 

इजाद हो रहा है 
ये हीरों के, रांझों के नगमे 

क्या अब भी, सुने जाते है हाँ वहाँ 

ओ हुसना

और

रोता है रातों में

पाकिस्तां क्या वैसे ही

जैसे हिन्दोस्तां 

ओ हुसना।

उनकी और रचनाएँ (इक बगल में चाँद/दुनिया)आगे की पोस्ट में आती रहेंगी

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Who,A Poem

A Beautiful Poem By Shri Aurbindo

Shri Aurbindo born in calcutta,was A Indian Philosopher,Poet,And Guru.

He Was Also Nominated For Nobel Prize.

In the blue of the sky, in the green of the forest, 

Whose is the hand that has painted the glow? 

When the winds were asleep in the womb of the ether, 

Who was it roused them and bade them to blow?

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He is lost in the heart, in the cavern of Nature, 

He is found in the brain where He builds up the thought: 

In the pattern and bloom of the flowers He is woven, 

In the luminous net of the stars He is caught. 

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In the strength of a man, in the beauty of woman, 

In the laugh of a boy, in the blush of a girl; 

The hand that sent Jupiter spinning through heaven, 

Spends all its cunning to fashion a curl. 

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There are His works and His veils and His shadows; 

But where is He then? by what name is He known? 

Is He Brahma or Vishnu? a man or a woman? 

Bodies or bodiless? twin or alone? 

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We have love for a boy who is dark and resplendent, 

A woman is lord of us, naked and fierce. 

We have seen Him a-muse on the snow of the mountains, 

We have watched Him at work in the heart of the spheres. 

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We will tell the whole world of His ways and His cunning; 

He has rapture of torture and passion and pain; 

He delights in our sorrow and drives us to weeping, 

Then lures with His joy and His beauty again. 

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All music is only the sound of His laughter, 

All beauty the smile of His passionate bliss; 

Our lives are His heart-beats, our rapture the bridal 

Of Radha and Krishna, our love is their kiss. 

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He is strength that is loud in the blare of the trumpets, 

And He rides in the car and He strikes in the spears; 

He slays without stint and is full of compassion; 

He wars for the world and its ultimate years.

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In the sweep of the worlds, in the surge of the ages, 

Ineffable, mighty, majestic and pure, 

Beyond the last pinnacle seized by the thinker 

He is throned in His seats that for ever endure. 

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The Master of man and his infinite Lover, 

He is close to our hearts, had we vision to see; 

We are blind with our pride and the pomp of our passions, 
We are bound in our thoughts where we hold ourselves free. 

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It is He in the sun who is ageless and deathless, 

And into the midnight His shadow is thrown; 

When darkness was blind and engulfed within darkness, 

He was seated within it immense and alone.

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Clementine Von Radics 2

2.पेश है Clementine Von Radics की कविता के कुछ अंश

When you are 13 years old, 

the heat will be turned up too high

and the stars will not be in your favor. 

You will hide behind a bookcase

with your family and everything left behind. 

You will pour an ocean into a diary. 

When they find you, you will be nothing

but a spark above a burning bush, 

still, tell them

Despite everything, I really believe people are good at heart.

There will always being those 

who say you are too young and delicate 

to make anything happen for yourself. 

They don’t see the part of you that smolders.

Don’t let their doubting drown out the sound 

of your own heartbeat.

You are the first drop of a hurricane.

Your bravery builds beyond you. You are needed

by all the little girls still living in secret, 

writing oceans made of monsters and

throwing like lightening.

You don’t need to grow up to find greatness.

You are stronger than the world has ever believed you to be.

The world laid out before you to set on fire.

All you have to do

is burn.

Posted in English Poems

Clementine Von Radics 1

क्लेमेंटाइन वोन रेदिक्स(Clememtine Von Radics) मेरे लिए एक नया नाम था,जब परिचय हुआ तो उनकी एक कविता पढने को मिली “Mouthful of Forevers.जैसे ही ये पढ़ी,लगा की और पढ़नी चाहिए,शब्दों का सटीक चयन और मानो फीलिंग्स को पोएट्री में घोल दिया गया हो।

उनकी दो खुबसूरत पोइम्स शेयर कर रहा हूँ नीचे,लेकिन पहले परिचय।

वोन रेदिक्स अभी सिर्फ 26 साल की हैं और सोशल साईट tumblr पर बहुत पढ़ी भी जाती हैं,उनकी कविता के नाम पे ही एक किताब भी आयी The mouthful of Forevers जो अमेज़न पर बेस्टसेलर भी रही।

वोन रेदिक्स की पोइम्स में प्यार,टीन एजेर्स,जीवन की खूबसूरती के बारे बार बार ज़िक्र होता है,

1.उनकी पहली पोईम Mouthful Of Forevers

I am not the first person you loved.

You are not the first person I looked at

with a mouthful of forevers. We

have both known loss like the sharp edges

of a knife. We have both lived with lips

more scar tissue than skin. Our love came

unannounced in the middle of the night.

Our love came when we’d given up

on asking love to come. I think

that has to be part

of its miracle.

This is how we heal.

I will kiss you like forgiveness. You

will hold me like I’m hope. Our arms

will bandage and we will press promises

between us like flowers in a book.

I will write sonnets to the salt of sweat

on your skin. I will write novels to the scar

of your nose. I will write a dictionary

of all the words I have used trying

to describe the way it feels to have finally,

finally found you.

And I will not be afraid

of your scars.

I know sometimes

it’s still hard to let me see you

in all your cracked perfection,

but please know:

whether it’s the days you burn

more brilliant than the sun

or the nights you collapse into my lap

your body broken into a thousand questions,

you are the most beautiful thing I’ve ever seen.

I will love you when you are a still day.

I will love you when you are a hurricane


अगली पोइम अगले पोस्ट में…………….


Courtesy-clementinevonradicspoems.tumblr.com




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मेरी रचना

मुझे गिरा कर आखिर कब तलक खड़ा होगा

एक दिन इसी मिट्टी में मेरे साथ पड़ा होगा।

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डर लगता है बड़े छायादार पेड़ो से मुझको बहुत

ये महफूज़ पौधा पीपल की छाँव में कैसे बड़ा होगा।

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उसकी बातो में खो क्यूँ जाते हो इतनी जल्दी

भूल जाते हो ज्यादा मीठा है,अंदर से सड़ा होगा।

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रात में चाँद को निहारने में घबराता है वो शख्स

कई दिनों से रोटी के बिन सड़क पर पड़ा होगा।

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मैं अब खुद ही किनारे हो जाता हूँ सड़को पर

कौन जाने कब किस बाहुबली से झगड़ा होगा।