Posted in स्वरचित, Hindi Urdu Poems

इन दौड़ती मंजिलो को

इन दौड़ती भागती मंजिलो को थाम दे जरा

आँखे चौंधिया गयी है खुदा, आराम दे जरा।

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न दिल टूटता है ,न कोई रूठता है अब

हम बेरोजगार मजदूरों को कोई काम दे जरा।

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मेरे यार ने कहा है आज,अब तो पीनी ही है

खाली सही ही सही,मगर इक जाम दे जरा।

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कागजों पे हर मर्ज़ का इलाज़ करने वाले को

अस्पताल की जिन्दा लाशो का पयाम दे जरा।

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जो बोले और चलते गए वो मंजिल पर है

करने वाले लोगों को भी अब इनाम दे जरा।

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ये बेचारी मशीने मेरी हर बात मानती है पर

फिर वही यारो से झगड़ने वाली शाम दे ज़रा।

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2 thoughts on “इन दौड़ती मंजिलो को

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