Posted in Hindi Urdu Poems

Piyush Mishra:A Rebel Poet

“शुक्र करो की हम दर्द सहते है,लिखते नहीं
वरना कागज़ पर लफ़्ज़ों के ज़नाज़े उठते”

.

ये पोस्ट उस शख्स के बारे में है जो 52 साल का हो चुका है लेकिन अल्फाज़ों से बिलकुल लौंडा है।
ग्वालियर में पैदा हुए और NSD से ग्रेजुएट है,गाते है लिखते है एक्टिंग करते है और थिएटर में भी सक्रिय है।

कभी शराबी और गुस्सैल हुआ करते थे और ये बात आज भी बेबाकी से कहते है।

पिंक और गुलाल आदि फिल्मो में भी अभिनय कर चुके है।

उनकी किताब कुछ इश्क किया कुछ काम किया उनका कविता संग्रह है।

पियूष मिश्रा उस भाषा में लिखते है जो आम आदमी तक सीधे पहुंचे।

उनका गाना “आरम्भ है प्रचंड बोल मस्तको के झुण्ड” बहुत फेमस हुआ था। 

उनके लिखे “इक बगल में चाँद होगा इक बगल में रोटिया/दुनिया” का जादू हर वर्ग के लोगो पर चला।

सबसे पहले बिस्मिल के गाने का पियूष मिश्रा वर्जन पढिये।

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सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है जोर कितना बाज़ू-ए-कातिल में है

वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां

हम अभी से क्या बताये क्या हमारे दिल में है

.
ओ रे बिस्मिल काश आते आज तुम हिन्दोस्तां

देखते कि मुल्क सारा ये टशन में थ्रिल में है

आज का लौंडा ये कहता हम तो बिस्मिल थक गए

अपनी आजादी तो भइय्या लौंडिया के तिल में हैं

.
आज के जलसों में बिस्मिल एक गूंगा गा रहा

और बहरों का वो रेला नाचता महफ़िल में है

हाथ की खादी बनाने का ज़माना लड़ गया

आज तो चड्ढी भी सिलती इंग्लिशों की मिल में है

सरफ़रोशी की  तमन्ना अब हमारे दिल में है

.
और अब पेश हैं दो शेर-

गुस्सा आदमी से बहुत कुछ करवाता है, 

और ये जो लव है ना लव? ये सिर्फ मरवाता है.

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आज मैंने फिर जज़्बात भेजे,

 आज तुमने फिर अलफ़ाज़ ही समझे.

वो बहुत अच्छा गाते भी है।
उनका कोक स्टूडियो में गाया हुआ गाना हुस्ना की लिंक शेयर कर रहा हूँ,साथ ही लिरिक्स भी

.
लाहौर के उस 

पहले जिले के 

दो परगना में पहुंचे 

रेशम गली के 

दूजे कूचे के 

चौथे मकां में पहुंचे 

और कहते हैं जिसको 

दूजा मुल्क उस

पाकिस्तां में पहुंचे 

लिखता हूँ ख़त में 

हिन्दोस्तां से

पहलू-ए हुसना पहुंचे 

ओ हुसना
मैं तो हूँ बैठा 

ओ हुसना मेरी 

यादों पुरानी में खोया 

पल-पल को गिनता 

पल-पल को चुनता

बीती कहानी में खोया 

पत्ते जब झड़ते 

हिन्दोस्तां में 

यादें तुम्हारी ये बोलें

होता उजाला हिन्दोस्तां में

बातें तुम्हारी ये बोलें

ओ हुसना मेरी

ये तो बता दो 

होता है, ऐसा क्या 

उस गुलिस्तां में 

रहती हो नन्हीं कबूतर सी

गुमसुम जहाँ 

ओ हुसना
पत्ते क्या झड़ते हैं 

पाकिस्तां में वैसे ही 

जैसे झड़ते यहाँ 

ओ हुसना

होता उजाला क्या

वैसा ही है 

जैसा होता हिन्दोस्तां यहाँ 

ओ हुसना 
वो हीरों के रांझे के नगमें 

मुझको अब तक, आ आके सताएं 

वो बुल्ले शाह की तकरीरों के

झीने झीने साये 

वो ईद की ईदी 

लम्बी नमाजें 

सेंवैय्यों की झालर

वो दिवाली के दीये संग में 

बैसाखी के बादल 

होली की वो लकड़ी जिनमें

संग-संग आंच लगाई

लोहड़ी का वो धुआं जिसमें

धड़कन है सुलगाई 

ओ हुसना मेरी 

ये तो बता दो

लोहड़ी का धुंआ क्या

अब भी निकलता है 

जैसा निकलता था

उस दौर में हाँ वहाँ

ओ हुसना
क्यों एक गुलसितां ये 

बर्बाद हो रहा है 

एक रंग स्याह काला 

इजाद हो रहा है 
ये हीरों के, रांझों के नगमे 

क्या अब भी, सुने जाते है हाँ वहाँ 

ओ हुसना

और

रोता है रातों में

पाकिस्तां क्या वैसे ही

जैसे हिन्दोस्तां 

ओ हुसना।

उनकी और रचनाएँ (इक बगल में चाँद/दुनिया)आगे की पोस्ट में आती रहेंगी

2 thoughts on “Piyush Mishra:A Rebel Poet

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