Posted in स्वरचित

मेरी रचना

मुझे गिरा कर आखिर कब तलक खड़ा होगा

एक दिन इसी मिट्टी में मेरे साथ पड़ा होगा।

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डर लगता है बड़े छायादार पेड़ो से मुझको बहुत

ये महफूज़ पौधा पीपल की छाँव में कैसे बड़ा होगा।

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उसकी बातो में खो क्यूँ जाते हो इतनी जल्दी

भूल जाते हो ज्यादा मीठा है,अंदर से सड़ा होगा।

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रात में चाँद को निहारने में घबराता है वो शख्स

कई दिनों से रोटी के बिन सड़क पर पड़ा होगा।

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मैं अब खुद ही किनारे हो जाता हूँ सड़को पर

कौन जाने कब किस बाहुबली से झगड़ा होगा।

2 thoughts on “मेरी रचना

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